यूपी की इन 10 सीटों पर ब्राह्मण तय करते हैं जीत-हार - लोकसभा चुनाव 2019

यूपी की राजनीति के 'ड्राइवर' रहे ब्राह्मण आखिर कैसे अब 'स्टेपनी' बनकर रह गए हैं. जानिए किन सीटों पर जीत हार तय करते हैं ...

यूपी की राजनीति के 'ड्राइवर' रहे ब्राह्मण आखिर कैसे अब 'स्टेपनी' बनकर रह गए हैं. जानिए किन सीटों पर जीत हार तय करते हैं ब्राह्मण?

 यूपी का राजनीतिक इतिहास इस बात का गवाह है कि राज्य का तीसरा सबसे बड़ा वोट बैंक 'ब्राह्मण' जिसकी तरफ खड़ा हो जाता है अक्सर उसी के पास कुर्सी भी होती है. बलरामपुर, बस्ती, संत कबीर नगर, महाराजगंज, गोरखपुर, देवरिया, जौनपुर, अमेठी, वाराणसी, चंदौली, कानपुर और इलाहाबाद वो सीटें हैं जहां ब्राह्मण जीत-हार तय करते हैं. 

 यूपी के 20 मुख्यमंत्रियों में 6 ब्राह्मण रहे और एनडी तिवारी तो तीन बार सीएम रहे. ब्राह्मणों ने 23 साल तक यूपी पर राज किया, जब सीएम नहीं भी रहे तो भी मंत्री पदों पर उनकी संख्या सबसे ज्यादा और बाकी जातियों की तुलना में सबसे बेहतर रही. 

 

 यूपी के 20 मुख्यमंत्रियों में 6 ब्राह्मण रहे और एनडी तिवारी तो तीन बार सीएम रहे. ब्राह्मणों ने 23 साल तक यूपी पर राज किया, जब सीएम नहीं भी रहे तो भी मंत्रिपदों पर उनकी संख्या सबसे और जातियों की तुलना में सबसे बेहतर रही. 

 

 फिलहाल मोदी मंत्रिमंडल में 11 केंद्रीय मंत्री ब्राह्मण हैं, जबकि पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बनी पहली केंद्र सरकार में सात ब्राह्मण मंत्री थे, जो कि उस मंत्रिमंडल का 30% था. 

 बहरहाल साल 1980 आया और मंडल कमीशन की रिपोर्ट पेश हुई, 10 साल बाद ये रिपोर्ट लागू हुई और यूपी में दलित-ओबीसी राजनीति ने ब्राह्मणों को पीछे धकेल दिया, मंडल के बाद भले ही बीजेपी भी सत्ता में आई लेकिन कोई ब्राह्मण सीएम नहीं बन पाया. 

 1990 के बाद वो वक़्त आया जब मजबूत ब्राह्मण नेता वसंत साठे, मधु दंडवते, रामकृष्ण हेगड़े चुनाव हारे और हाशिए पर चले गए. मंडल के बाद यूपी में ब्राह्मणों की भूमिका बदली और वो 'ड्राइविंग फ़ोर्स' की जगह'सपोर्टिव वोट बैंक' में बदल गए. 

 मंडल के बाद सत्ता में न सिर्फ ब्राह्मणों की भागीदारी कम होती गई बल्कि वक़्त के साथ उन्हें अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए सपा-बसपा जैसी उन पार्टियों के साथ भी खड़ा होना पड़ा जिनकी राजनीति का आधार ही ब्राह्मणों की सत्ता को चुनौती देना था. 

 पिछले 5 विधानसभा चुनावों की बात करें तो हर पार्टी ने चुनाव में ब्राह्मण कार्ड खेला. जिससे पार्टियों को अच्छा फायदा भी देखने को मिला. 

 बसपा के टिकट पर 1993 में एक भी ब्राह्मण विधायक चुनकर विधानसभा नहीं पहुंच पाया था. हालांकि इसके बाद 1996 में 2, 2002 चुनाव में 4, 2007 में 41 और 2012 में 10 ब्राह्मण विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचे. 2017 में भी बसपा ने 66 ब्राह्मणों को टिकट दिया था. 

 बीजेपी की बात करें तो 1993 में बीजेपी के 17, साल 1996 चुनाव में 14, 2002 चुनाव में 8 विधायक, 2007 में 3 और 2012 में 6 ब्राह्मण विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे. 2017 में भी 17% से ज्यादा ब्राह्मण विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचे हैं. 

 सपा की बात करें तो 1993 में 2 विधायक, 1996 में 3, 2002 में 10 विधायक, 2007 में 11 और 2012 में 21 ब्राह्मण विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे. 2017 में भी सपा ने 10% ब्राह्मणों को टिकट दिया था. कांग्रेस से 1993 में 5 विधायक, 1996 में 4, 2002 में 1, 2007 में 2 और 2012 में 3 ब्राह्मण विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे जबकि 2017 में कांग्रेस ने 15% ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था. 

 2007 के विधानसभा चुनावों में मायावती ने जब दलित, ब्राह्मण सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग किया, तो यह यूपी के इतिहास का सबसे सफल प्रयोग साबित हुआ. पहली बार मायावती की पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनी. दलितों की पार्टी कही जाने वाली बीएसपी में दूसरे नंबर के नेता का कद सतीश चन्द्र मिश्रा को दिया गया. 2007 के चुनावों में मायावती ने ब्राह्मणों को उम्मीदवार बनाया, दलित-ब्राह्मण गठजोड़ के चलते 41 ब्राह्मण प्रत्याशी जीते भी. 

 मायावती ने कई ब्राह्मण नेताओं को भी मंत्रिमंडल में जगह दी थी. 2007 के चुनावों की तरह ही 2009 के लोकसभा चुनाव में भी मायावती ने एक बार फिर सोशल इंजीनियरिंग की आजमाया. मायावती ने 2009 के चुनाव में सबसे अधिक 20 सीटों पर ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे थे.

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