चुनाव आयोग को देश में संविधान लागू होने से पहले ही बना दिया गया था. अभी तक कुल 23 चुनाव आयुक्त हो चुके हैं. 26 जनवरी 1950 को भारत में...
चुनाव आयोग को देश में संविधान लागू होने से पहले ही बना दिया गया था. अभी तक कुल 23 चुनाव आयुक्त हो चुके हैं.
26 जनवरी 1950 को भारत में गणतंत्र लागू होने के एक दिन पहले ही भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की स्थापना कर दी गई थी. भारतीय निर्वाचन आयोग यानी चुनाव आयोग भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने वाली एक स्वायत्त और अर्ध-न्यायिक संस्था है. यही संस्था पूर्व की तरह लोकसभा चुनाव 2019 का भी आयोजन करवा रही है.
मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्तों के नेतृत्व में 2019 के लोकसभा चुनाव कराए जा रहे हैं. 10 मार्च, 2019 को इसकी घोषणा कर दी गई. लेकिन जब चुनाव आयोग गठित हुआ तो तब इसकी संचरना ऐसी ना थी. जानिए, चुनाव आयोग का अब तक का पूरा इतिहास.
चुनाव आयोग की स्थापना व संरचना
किसी देश में लोकतंत्र होने का प्रतीक है वहां जनता के द्वारा चुने प्रतिनिधियों का शासन. इसलिए भारत में लोकतंत्र की स्थापना से पहले उस संस्थान की स्थापना की गई जो भारत में जनता के प्रतिनिधियों के चुनने के लिए जिम्मेवार होगी. तब इसकी संरचना के अनुसार साल 1950 से 15 अक्टूबर, 1989 तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त ही इसका नेतृत्व करते थे. उनके साथ एक एकल-सदस्यीय निकाय हुआ करता था. पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन थे.
अक्टूबर, 1989 में चुनाव आयोग की संरचना में बदलाव किया गया. इसके बाद चुनाव आयोग तीन सदस्यीय निकाय बना. लेकिन जल्द ही यह प्रस्ताव रद्द हो गया और फिर एक ही नेतृत्वकर्ता की टीम काम करने लगी. तीन साल की उठा-पटक के बाद अंततः अक्टूबर 1993 से फिर से तीन सदस्यीय व्यवस्था अमल में लाई गई. तब से अब तक यही व्यवस्था काम कर रही है.
वर्तमान में सुनील अरोड़ा मुख्य चुनाव आयुक्त और अशोक लवासा व सुशील चंद्रा चुनाव आयुक्त हैं. चुनाव आयोग लोकसभा चुनाव, विधानसभा चुनाव, राज्यसभा चुनाव, विधानमंडल चुनाव और राष्ट्रपति चुनाव कराता है. जबकि दूसरे चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग कराता है.
राज्य निर्वाचन आयोग
ग्राम पंचायत, नगर पालिका, महानगर परिषद् और तहसील और जिला परिषद के चुनावों की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग की होती है. यह संस्था भी स्वायत्त होती है. लेकिन यह चुनाव आयोग के निर्देशन में काम करती है.
चुनाव आयोग की ताकत
चुनाव संबंधी नियमों-कानूनों फैसलों इत्यादि के मामलों में चुनाव आयोग केवल संविधान द्वारा स्थापित निर्वाचन विधि के ही अधीन होता है और इसी के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है. अन्यथा कोई शक्ति चुनाव आयोग को आदेश या निर्देश नहीं दे सकती.

खुद सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के बारे में कहता है, "वह एकमात्र अधिकरण है जो चुनाव कार्यक्रम निर्धारित करे, चुनाव करवाना केवल उसी का कार्य है." एक अन्य जनप्रतिनिधित्व एक्ट 1951 के अनुसार, राष्ट्रपति किसी भी राज्यपाल को निर्वाचन अधिसूचना जारी करने का अधिकार दे सकते हैं. लेकिन इसके लिए उन्हें निर्वाचन आयोग से सलाह लेनी होगी और उसके निर्देशन के अनुरूप ही निर्देश जारी करने होंगे.
आदर्श आचार्य संहिता
चुनाव आयोग किसी भी चुनाव की घोषणा के साथ ही उस चुनाव से संबंधित सीमाओं के भीतर आदर्श आचार संहिता लागू करने का अधिकार रखता है. संविधान में चुनाव आचार्य संहिता का उल्लेख नहीं है. लेकिन निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के लिए आयोग इसे लागू करता है.
इसमें चुनाव प्रचार, प्रचार पर खर्च होने वाले पैसे, भाषण में संयम से लेकर उनके प्रचार जत्थे तक पर नजर रखी जाती है. इसी के तहत विजयी उम्मीदवारों की सूची राज्यों को सौंपने का भी कार्य आता है. यानी कि चुनाव आयोग ने अपने कामकाज के लिए अपनी एक गाइडलाइन बना रखी है. इसके उल्लंघन पर चुनाव आयोग उचित कार्रवाई करता है.
मुख्य चुनाव आयुक्त
भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त, राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं. नियमानुसार कोई भी चुनाव आयुक्त अधिकतम अपनी आयु के 65वें साल तक पद पर रह सकता है, चाहे उसका कार्यकाल अभी बाकी हो. 65 वर्ष की आयु पूरी कर करने वाला शख्स मुख्य चुनाव आयुक्त नहीं बन सकता. जबकि एक मुख्य चुनाव आयुक्त अधिकतम छह वर्ष तक ही पद पर रह सकता है. मुख्य चुनाव आयुक्त हटाने के लिए महाभियोग ही एकमात्र उपाय है.

अब तक मुख्य चुनाव आयुक्तों की सूची
सुकुमार सेन
केवीके सुंदरम
एसपी सेन वर्मा
डॉ. नगेन्द्र सिंह
टी. स्वामीनाथन
एसएल शकधर
आरके त्रिवेदी
आरवीएस शास्त्री
वीएस रमादेवी
टीएन शेषन
एमएस गिल
जेएम लिंगदोह
टीएस कृष्णमूर्ति
बीबी टंडन
एन गोपालस्वामी
नवीन चावला
शाहबुद्दीन याकूब कुरैशी
वीएस संपत
एचएस ब्रह्मा
नसीम जैदी
अचल कुमार ज्योति
ओम प्रकाश रावत
सुनील अरोड़ा
जब शेषन ने रुकवा दिए थे चुनाव
चुनाव आयुक्त टीएन शेषन पर कांग्रेसी होने का ठप्पा लगा था, लेकिन जल्दी ही कांग्रेस को समझ में आ गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त टीएनशेषन को न तो पिछला उपकार याद दिलाकर रोका जा सकता है, न ही लालच दिखाकर डिगाया जा सकता है. कोई चाहे तो मिसाल के तौर पर कांग्रेस के विजय भास्कर रेड्डी और संतोष मोहन देव के साथ शेषन के बर्ताव को याद कर सकता है.
विजय भास्कर रेड्डी को आंध्रप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया और पद पर बने रहने के लिए नियम के मुताबिक उनके लिए छह महीने के भीतर चुनाव में निर्वाचित होना जरूरी था. शेषन ने उपचुनाव कराने से इनकार कर दिया. तर्क दिया कि विजय भास्कर रेड्डी की जरूरत के हिसाब से उपचुनाव नहीं होंगे. जब बाकी जगहों के उपचुनाव होंगे तो ही आंध्रप्रदेश में उपचुनाव कराए जाएंगे.

त्रिपुरा के चुनाव (1988) में कांग्रेस को जीत दिलाने वाले संतोष मोहन देव
(केंद्रीय मंत्री) भी एक दफे टीएन शेषन का निशाना बने. 1993 के त्रिपुरा
विधानसभा के चुनाव फरवरी महीने में होने वाले थे. शेषन ने चुनाव स्थगित कर
दिए. कहा जब तक उन पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हो जाती जिनकी संतोष
मोहन देव के साथ चुनाव-प्रचार के दौरान मिलीभगत की खबरें आई हैं, तब तक
त्रिपुरा में चुनाव नहीं होंगे. त्रिपुरा में चुनाव अप्रैल (1993) में हुए,
पुलिस अधिकारियों पर सरकार को कार्रवाई करनी पड़ी.
कानून के पालन पर अडिग शेषन ने अर्जुन सिंह को भी नहीं बख्शा. मध्यप्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश में बीजेपी की सरकारों को भंग करने के बाद पीवी नरसिम्हाराव सरकार के सबसे ताकतवर मंत्रियों में शुमार अर्जुन सिंह ने कहा कि इन राज्यों में चुनाव एक साल बाद होंगे. शेषन ने तुरंत प्रेस विज्ञप्ति जारी कर याद दिलाया कि चुनाव की तारीख मंत्रिगण या प्रधानमंत्री नहीं बल्कि चुनाव आयोग तय करता है.
शेषन के ऐसे फैसलों से चिढ़कर एक दफे नरसिम्हाराव ने उनसे निजात पाने की सोची. द इंडिपेंडेंट अखबार में छपे लेख में टिम मैक्गिर्क ने वो किस्सा कुछ यों बयान किया है: एक दफे प्रधानमंत्री राव ने शेषन को बुलाया और कहा, 'शेषन! कहिए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं. उन्होंने शेषन के सामने दो विकल्प रखे. कहा कि आप चाहें तो किसी राज्य के राज्यपाल बन जाएं या फिर वॉशिंगटन में भारत के राजदूत. शेषन ने इनकार कर दिया. इस वाकये को याद करते हुए बाद में शेषन ने मजाकिया अंदाज में कहा, 'मुझे उपहार में सिर्फ गणेश की मूर्तियां अच्छी लगती हैं. इसलिए कि मैं खुद ही बहुत कुछ गणेश की तरह दिखता हूं.'
शेषन आज अपनी उम्र के आठवें दशक में ऐसी आलोचनाओं और प्रशंसाओं से बहुत दूर जा चुके हैं. लेकिन चेन्नई के उनके घर पर आप कभी समय निकालकर जाएं और बीती बातों को पूछें तो वे आपको यह जरूर बताएंगे, 'मैं राजनीति से नहीं, बुरे राजनेताओं से नफरत करता हूं.'
26 जनवरी 1950 को भारत में गणतंत्र लागू होने के एक दिन पहले ही भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की स्थापना कर दी गई थी. भारतीय निर्वाचन आयोग यानी चुनाव आयोग भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने वाली एक स्वायत्त और अर्ध-न्यायिक संस्था है. यही संस्था पूर्व की तरह लोकसभा चुनाव 2019 का भी आयोजन करवा रही है.
मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्तों के नेतृत्व में 2019 के लोकसभा चुनाव कराए जा रहे हैं. 10 मार्च, 2019 को इसकी घोषणा कर दी गई. लेकिन जब चुनाव आयोग गठित हुआ तो तब इसकी संचरना ऐसी ना थी. जानिए, चुनाव आयोग का अब तक का पूरा इतिहास.
चुनाव आयोग की स्थापना व संरचना
किसी देश में लोकतंत्र होने का प्रतीक है वहां जनता के द्वारा चुने प्रतिनिधियों का शासन. इसलिए भारत में लोकतंत्र की स्थापना से पहले उस संस्थान की स्थापना की गई जो भारत में जनता के प्रतिनिधियों के चुनने के लिए जिम्मेवार होगी. तब इसकी संरचना के अनुसार साल 1950 से 15 अक्टूबर, 1989 तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त ही इसका नेतृत्व करते थे. उनके साथ एक एकल-सदस्यीय निकाय हुआ करता था. पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन थे.

अक्टूबर, 1989 में चुनाव आयोग की संरचना में बदलाव किया गया. इसके बाद चुनाव आयोग तीन सदस्यीय निकाय बना. लेकिन जल्द ही यह प्रस्ताव रद्द हो गया और फिर एक ही नेतृत्वकर्ता की टीम काम करने लगी. तीन साल की उठा-पटक के बाद अंततः अक्टूबर 1993 से फिर से तीन सदस्यीय व्यवस्था अमल में लाई गई. तब से अब तक यही व्यवस्था काम कर रही है.
वर्तमान में सुनील अरोड़ा मुख्य चुनाव आयुक्त और अशोक लवासा व सुशील चंद्रा चुनाव आयुक्त हैं. चुनाव आयोग लोकसभा चुनाव, विधानसभा चुनाव, राज्यसभा चुनाव, विधानमंडल चुनाव और राष्ट्रपति चुनाव कराता है. जबकि दूसरे चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग कराता है.
राज्य निर्वाचन आयोग
ग्राम पंचायत, नगर पालिका, महानगर परिषद् और तहसील और जिला परिषद के चुनावों की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग की होती है. यह संस्था भी स्वायत्त होती है. लेकिन यह चुनाव आयोग के निर्देशन में काम करती है.
चुनाव आयोग की ताकत
चुनाव संबंधी नियमों-कानूनों फैसलों इत्यादि के मामलों में चुनाव आयोग केवल संविधान द्वारा स्थापित निर्वाचन विधि के ही अधीन होता है और इसी के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है. अन्यथा कोई शक्ति चुनाव आयोग को आदेश या निर्देश नहीं दे सकती.

खुद सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के बारे में कहता है, "वह एकमात्र अधिकरण है जो चुनाव कार्यक्रम निर्धारित करे, चुनाव करवाना केवल उसी का कार्य है." एक अन्य जनप्रतिनिधित्व एक्ट 1951 के अनुसार, राष्ट्रपति किसी भी राज्यपाल को निर्वाचन अधिसूचना जारी करने का अधिकार दे सकते हैं. लेकिन इसके लिए उन्हें निर्वाचन आयोग से सलाह लेनी होगी और उसके निर्देशन के अनुरूप ही निर्देश जारी करने होंगे.
आदर्श आचार्य संहिता
चुनाव आयोग किसी भी चुनाव की घोषणा के साथ ही उस चुनाव से संबंधित सीमाओं के भीतर आदर्श आचार संहिता लागू करने का अधिकार रखता है. संविधान में चुनाव आचार्य संहिता का उल्लेख नहीं है. लेकिन निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के लिए आयोग इसे लागू करता है.
इसमें चुनाव प्रचार, प्रचार पर खर्च होने वाले पैसे, भाषण में संयम से लेकर उनके प्रचार जत्थे तक पर नजर रखी जाती है. इसी के तहत विजयी उम्मीदवारों की सूची राज्यों को सौंपने का भी कार्य आता है. यानी कि चुनाव आयोग ने अपने कामकाज के लिए अपनी एक गाइडलाइन बना रखी है. इसके उल्लंघन पर चुनाव आयोग उचित कार्रवाई करता है.
मुख्य चुनाव आयुक्त
भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त, राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं. नियमानुसार कोई भी चुनाव आयुक्त अधिकतम अपनी आयु के 65वें साल तक पद पर रह सकता है, चाहे उसका कार्यकाल अभी बाकी हो. 65 वर्ष की आयु पूरी कर करने वाला शख्स मुख्य चुनाव आयुक्त नहीं बन सकता. जबकि एक मुख्य चुनाव आयुक्त अधिकतम छह वर्ष तक ही पद पर रह सकता है. मुख्य चुनाव आयुक्त हटाने के लिए महाभियोग ही एकमात्र उपाय है.

मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा
अब तक मुख्य चुनाव आयुक्तों की सूची
सुकुमार सेन
केवीके सुंदरम
एसपी सेन वर्मा
डॉ. नगेन्द्र सिंह
टी. स्वामीनाथन
एसएल शकधर
आरके त्रिवेदी
आरवीएस शास्त्री
वीएस रमादेवी
टीएन शेषन
एमएस गिल
जेएम लिंगदोह
टीएस कृष्णमूर्ति
बीबी टंडन
एन गोपालस्वामी
नवीन चावला
शाहबुद्दीन याकूब कुरैशी
वीएस संपत
एचएस ब्रह्मा
नसीम जैदी
अचल कुमार ज्योति
ओम प्रकाश रावत
सुनील अरोड़ा
जब शेषन ने रुकवा दिए थे चुनाव
चुनाव आयुक्त टीएन शेषन पर कांग्रेसी होने का ठप्पा लगा था, लेकिन जल्दी ही कांग्रेस को समझ में आ गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त टीएनशेषन को न तो पिछला उपकार याद दिलाकर रोका जा सकता है, न ही लालच दिखाकर डिगाया जा सकता है. कोई चाहे तो मिसाल के तौर पर कांग्रेस के विजय भास्कर रेड्डी और संतोष मोहन देव के साथ शेषन के बर्ताव को याद कर सकता है.
विजय भास्कर रेड्डी को आंध्रप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया और पद पर बने रहने के लिए नियम के मुताबिक उनके लिए छह महीने के भीतर चुनाव में निर्वाचित होना जरूरी था. शेषन ने उपचुनाव कराने से इनकार कर दिया. तर्क दिया कि विजय भास्कर रेड्डी की जरूरत के हिसाब से उपचुनाव नहीं होंगे. जब बाकी जगहों के उपचुनाव होंगे तो ही आंध्रप्रदेश में उपचुनाव कराए जाएंगे.

टीएन शेषन
कानून के पालन पर अडिग शेषन ने अर्जुन सिंह को भी नहीं बख्शा. मध्यप्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश में बीजेपी की सरकारों को भंग करने के बाद पीवी नरसिम्हाराव सरकार के सबसे ताकतवर मंत्रियों में शुमार अर्जुन सिंह ने कहा कि इन राज्यों में चुनाव एक साल बाद होंगे. शेषन ने तुरंत प्रेस विज्ञप्ति जारी कर याद दिलाया कि चुनाव की तारीख मंत्रिगण या प्रधानमंत्री नहीं बल्कि चुनाव आयोग तय करता है.
शेषन के ऐसे फैसलों से चिढ़कर एक दफे नरसिम्हाराव ने उनसे निजात पाने की सोची. द इंडिपेंडेंट अखबार में छपे लेख में टिम मैक्गिर्क ने वो किस्सा कुछ यों बयान किया है: एक दफे प्रधानमंत्री राव ने शेषन को बुलाया और कहा, 'शेषन! कहिए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं. उन्होंने शेषन के सामने दो विकल्प रखे. कहा कि आप चाहें तो किसी राज्य के राज्यपाल बन जाएं या फिर वॉशिंगटन में भारत के राजदूत. शेषन ने इनकार कर दिया. इस वाकये को याद करते हुए बाद में शेषन ने मजाकिया अंदाज में कहा, 'मुझे उपहार में सिर्फ गणेश की मूर्तियां अच्छी लगती हैं. इसलिए कि मैं खुद ही बहुत कुछ गणेश की तरह दिखता हूं.'
शेषन आज अपनी उम्र के आठवें दशक में ऐसी आलोचनाओं और प्रशंसाओं से बहुत दूर जा चुके हैं. लेकिन चेन्नई के उनके घर पर आप कभी समय निकालकर जाएं और बीती बातों को पूछें तो वे आपको यह जरूर बताएंगे, 'मैं राजनीति से नहीं, बुरे राजनेताओं से नफरत करता हूं.'

COMMENTS